स्वागत

मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है आप सभी के मार्गदर्शन का इंतजार रहेगा

Sunday, March 27, 2011

खोते रहस्यों से रूबरू कराती एक यात्रा :Hertiage walk

इमामबारा
हम सब ने लखनऊ  को देखा है हम सब इसके बारे में जानते है लखनऊ की कुछ चीज़े है जो पूरी दुनिया में मशहूर है पूरे विश्व से लोग लखनऊ आते है और यहाँ की तहजीब और नजाकत को महसूस करते है |
लखनऊ अब दो हिस्सों में है एक हिस्सा है नया लखनऊ जो आज के आधुनिक युग के साथ कदम से कदम मिलकर चल रहा है जिसे हर सख्स देखता है जहा जिंदगी दुनिया दुनिया की दौड़ में सबसे आगे निकलने के लिए भागती है जहा हर सख्स अपने पडोसी से मिलो आगे निकलने के लिए दौड़ में मसरूफ है और दूसरा है पुराना लखनऊ जो सदियों पुराणी कहानियो और तहजीब को अपनी तंग गलियों और पुराणी इमारतों में आज भी समेटे हुए है | ये इमारते बूढी हो चुकी है फिर भी अपने अन्दर पीढियों का इतिहास समेटे हुए शान से अपनी कहानी खुद कहती है |
इस लखनऊ को देखने का आप सब्सासन और अच्छा रास्ता उत्तर प्रदेश टूरिस्म की तरफ से मिलने वाली यात्रा Heritage  Walk  इस यात्रा के साथ न सिर्फ आप इसे देख सकते है साथ आप इसे महसूस कर सकते है इसे जी सकते है |
२६-मार्च-२०११ सुबह ८:०० बजे मैंने ये यात्रा अपने कुछ साथियों और हमारे गुइदे नावेद जिया जी ,इमरान हासमी जी और आतिफ जी के साथ की इस यात्रा के दौरान न सिर्फुन्होने हमें एतहासिक लखनऊ से रूबरो कराया साथ ही हमे इसे महसूस करने का मौका भी प्रदान किया |
हमारी यात्राशुरु हुई टीले वाली मस्जिद से ये मस्जिद लाल पूल (पक्के पुल )के सामने है इस मस्जिद की जो एतहासिक जानकारी उपलब्ध है उसके हिसाब से इस मस्जिद का निर्माण नवाब आसिफ अली ने १७७५ में करवाया था ये मस्जिद उस वक़्त सहर के सबसे ऊँचे टीले पर थी जिस वजह से इसे टीले वाली मस्जिद कहते है इस मस्जिद के अन्दर ही एक दरगाह है जो हजरत सय्यद शाह की है |
इस दरगाह के अनदार कुरआन की आयते लिखी है और कहा जाता है इस पर पानी डालकर पीने से मन की मुराद पूरी होती है | इस मस्जिद के पिछले हिस्से में जाकर देखने पर गोमती नदी दिखती है जिसे पहले पूरे लखनऊ में घूमकर बहने के कारन घूमती नदी कहते थे और साथ ही दीखता है इसका पुल इस पुल पर मीनारे बनी हुई है इन मीनारों का इस्तेमाल यहाँ आने वाली बाढ़ को देखने के लिया किया जाता था इसे लाल पुल कहते है और अब इसे पक्का पुल कहते है |

टीले वाली मस्जिद के अन्दर का द्रश्य

इस मस्जिद से निकल कर हम बढे पुराने लखनऊ की तरफजहा आपको सामने देखने पर मिलता है रूमी दरवाजा जो एक ज़माने से अपने अन्दर तहजीब और इतिहास को छुपाये खड़ा हुआ है | पुराने समय में इसका इस्तेमाल सुरक्षा की द्रष्टि से बहुत अधिक था इस दरवाजे के ऊपर बनी मीनार पर सिपाही कहदे होकर चारो तरफ ५-५ किलो मित्रे तक देख सकते थे और उन्हें यदि कोई दुश्मन आता दिखाई देता था तो वाही से झंडा दिखाकर इसकी जानकारी अपने सिपह्यियो को देते थे |
इस दरवाज़े के पास ही है बार इमामबारा गाइड नवेदजी ने बाते की इमामबारा कोई एताहसिक्क ईमारत नहीं है बल्कि ये एक धार्मिक ईमारत है इमामबारा का इस्तेमाल सिर्फ जिक्र (religious meeting ),मज्लिश (condolence meeting) ,या महफ़िल के ;लिए किया जाता था इमामबारा लखौरी इतो और गारा का बना हुआ है और लगभग २५० वर्षो से खड़ा हुआ है| इमाबारे के पिछले हिस्से से निकलते हुए हम बढ़ते है गोल दरवाज़े की और यहाँ रास्ते में हमे फूलो की मंदी मिली जहा बहुत प्रकार के फूलो की थोक बिक्री होती है गोल दरवाज़े पर पहुचने पर हमे मिलती है पहलवान जी की ठंडे की दूकान जो की लगभग सौ सालो से चल रही और यहाँ बहुत ही स्वादिष्ट ठंडे मिलती है |यही है एक पुराण अमा कलि का मंदिर कहा जाता है की यहाँ मांगी जाने वाली हर इच्छा पोरी होती है | इस मंदिर की ख़ास बात है ये मंदिर छोटा है मगर यहाँ के लोगो की इसमें बड़ी श्रद्धा है और यहाँ पुरुष की जगह एक महिला पुजारी है |
कल्ली  रामजी का मंदिर में लगी राम दरबार की प्रतिमा
यहाँ से आगे बढ़ने पर है काली राम जी का मंदिर इस मंदिर में सवाले राम की प्रतिमा है और यहाँ राम दरबार की जो प्रतिमा है उसमे सीताजी की स्थान मध्य में है जिस कारन से यह विस्वा का एकलौता ऐसा मंदिर है जिसमे राम दरबार की एक अलग छवि दिखाती है | यहाँ से कुछ दूरी पर है किंग यूनानी अस्पताल इस अस्पताल में आज भी यूनानी विधि से दवाओ का निर्माण स्वतः किया जाता है और हर प्रकार के रोग का इलाज़ किया जाता है | इस अस्पताल की देख रेख चंदे के द्वारा होती है ये मुफ्त इलाज प्रदान करते है |
यूनानी अस्पताल से हम आगे बढ़ते है फिरंगी कोठी की तरफ ये कोठी फिरंगियों को नवाब वाजिद अली शाह ने दी थी ये लोग यहाँ पर नील और घोड़ो का व्यापार करते थे और इस कोठी के पास ही है कप्तान का कुआ हलकी इस कुए के उपसर अब एक दूकान बन गई है जिसमे आज चिकन के कपरो का कारोबार होता है | इसके आगे एक कोठी है जहा हमारी मुलाक़ात नुझात जी से हुई जिन्होंने बताया की इस महल में वो अपने परिवार की १२वि पुश्त है और इसी इ महल में गांधीजी ,सरोजनी नायडू और अन्य लोगो आजदी की जुंग के लिए मीटिंग की थी , उन्होंने बाते की गाँधीजी सिर्फ दो बार लखनऊ ए थे और दोनों बार उन्ही के महल में रहे थे साथ ही उन्होंने वो जगह भी दिखाई जहा आजादी की मीटिंग हुई थी जो की एक तह खाने जैसी जगह थी यहाँ से आगे बढ़ने पर सकरी गली है और इस गली में दोनों तरफ फूलो की दुकाने है इन्ही की वजह से इस गली का नाम है फूलो वाली गली इस गली में मिलने वाले फूलो का इस्तेमाल पुराने ज़माने में दो तरह से होता था एक तो इस गली में मंदिर बहुत है और लोग मंदिर में चड़ने के लिए यहाँ से फूल खरीदते थे और दोस्सरा यही पास में मुजरा करने वाली रहती थी जिनसे मिलने वाले लोग भी उनके लिए फूल लेकर जाते थे इसी संकरी गली से आगे बढ़ने पर शुरात होती है यहाँ के तोलो की और इन्ही तोलो में से एक टोला है कटारी टोला इसे छोटी कशी भी कहा जाता है क्योंकि यहाँ बहुत सारे छोटे बड़े मंदिर है और साथ ही विस्वनाथ जी का भी मंदिर है यहाँ से आप पुराने जमने की टोला व्यवस्था को समझ सकते है जहा हर तोले में दो गाते होते थे और इनके बंद होते है पूरा टोला बंद हो जाता था और साथ ही हर एक तोले में एक ही तरह का काम करने वाले के लोग रहते थे इन तोलो के गाते तो छोटे होते है मगर अन्दर से ये बहुत बड़े होते है इसी प्रकार इनकी कोठिया भी होती थी जिनके दरवाज़े छोटे छोटे होते है मगर अन्दर से कोठी बहुत विसाल होती है इन तोलो में बहुत सी पुराणी इमारते भी है और बहुत सी नयी भी बन गई है मगर भव्यता की कहानी इनकी पुराणी इमारते आज भी कहते है इन के ऊपर एक लाइन बिलकुल फिट बैठती है " की खंडहर बताता है की महल कभी अलिसान रहा होगा " इन्ही पुराणी कोथोयो में एक है नेपाली कोठी जहा रहने वाले लोग नेपाल से आए थे और फिर यही बस गए और आज भी ये लोग अपना पुस्तानी रोज़गार ही करते है यहाँ से आगे बढ़ने पर हमे मिलता है एक बड़ा मार्केट जहा सुनार और चिका के कपड़ो का व्यापार करने वाले व्यापारियों की दुकाने है इसी के साथ यहाँ आप चांदी कवारक बनाते देख सकते है जिसमे चांदी के छोटे से टुकड़े को हथोडी से पीट पीट कर बढया जाता है और ये हथोडी के आवाज भी अपनी तरह का अलग संगीत पैदा करती है और इसी मार्केट में है एक इतर की दूकान जहा स्वनिर्मित इतर की बिक्री होती है इसके विक्रेता अपने आप इन इतरो का निर्माण फूलो और हेर्ब्स से करते है और जब ये यात्रा करते करते आप थक जाये और आप को जोर की भूख लगे तो यहाँ आप को मिलेंगे कोल्चे जो शुद्ध तरीके से आप के सामने बनते है या आप खा सकते थे पूरे विश्व में प्रसिद्ध तुन्दय के कबाब क्योंकि इसी गली में है असली और सबसे पुराणी तुन्दय कब्बाब की दुकान और इसी के साथ  हमरे ये यात्रा भी समाप्त होती है |




अंत में मई धन्यवाद देना चाहूँगा  हमारे बेच के साथ- साथ हमारे गाइड नवेद, आतिफ और इमरान हाश्मी जी का जिन्होंने हमें  पूरा सहयोग दिया और पुराने लखनऊ को और करीब से देखने समझाने और जीने का मौका दिया |

No comments:

Post a Comment